कोरोना के बारे में सबसे पहले खुलासा करने वाले डाक्टर को चीन ने मरवाया, खोल दी थी इन्होने चीन की पोल


चीन से 7 फरवरी को एक नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉक्टर की मृत्यु की खबर आती है। इस डॉक्टर की मृत्यु के बाद चीन कि जनता समेत पूरी दुनिया सकते में पड़ जाती है कि उस बहादुर डॉक्टर को आखिर क्या हुआ। डॉक्टर बहादुर इसीलिए क्योंकि यही वह डॉक्टर है जिसने पूरी दुनिया को आने वाले सबसे बड़े खतरे के बारे में बताया। चीन के वुहान हॉस्पिटल में काम करने वाले डॉ. ली ने ही पहली बार यह बताया कि वुहान क्षेत्र से SARS-कोरोना बीमारी ने जन्म ले लिया है और यह एक बड़े महामारी का रूप लेने वाली है। लेकिन इसी बीच 7 फरवरी को उस डॉक्टर की मृत्यु हो जाती है और इसका कारण वही SARS-CoV-2 को बताया जाता है।

दरअसल चीन के हुबेई प्रान्त के वुहान क्षेत्र में अक्टूबर-नवंबर के माह से ही कुछ विचित्र बीमारी लेकर मरीज अस्पताल पहुँच रहे थे। इसी बीच 30 दिसंबर, 2019 को डॉक्टर ली वेनलियांग ने अपने कुछ साथी डॉक्टरों को इस बीमारी के प्रकोप के बारे में जानकारी दी। डॉ. ली ने जानकारी को चेतावनी के रूप बताते हुए कहा कि यह बीमारी “कोरोना वायरस समूह” के SARS से पूरी तरह मेल खाता है।

डॉ. ली ने अपने मित्रों और साथियों को एक बड़े खतरे और संभावित संक्रमण से बचाने के लिए निजी संदेश के रूप में यह जानकारी भेजी थी। लेकिन कुछ दिनों के बाद उन्हें वुहान के पुलिस स्टेशन में बुलाया गया जहाँ उनपर भ्रामक जानकारियां फैलाने का आरोप लगाया गया। इसके साथ ही डॉ. ली से इन आरोपो के लिखित दस्तावेज पर जबरदस्ती हस्ताक्षर भी लिया गया।

दरअसल, डॉ. ली वुहान से निकले इस चाईनीज़ वायरस (कोरोना वायरस) के प्रकोप को पहचानने वाले शुरुआती लोगों में से एक थे, जिसका फैलाव अब 20 मार्च, 2020 तक 183 देशों के 2,66,179 लोगों तक हो चुका है और 11,186 लोग मारे जा चुके हैं। आधी दुनिया लॉकडाउन हो चुकी है। वैश्विक अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है। सब कुछ एक वामपंथी देश के सिरफिरे मदहोशी की वजह से।

34 वर्षीय डॉ. ली ने इस वामपंथी चीनी तानाशाह की असलियत का उजागर दुनिया के सामने किया और इसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी। ली ने अपने आरोपो के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के बाद वापस अस्पताल लौट आये थे। इसके बाद चीनी सरकार द्वारा बताया गया कि उन्हें एक मरीज का इलाज करने के दौरान कोरोना वायरस हुआ जिसके चलते उनकी मृत्यु हो गई। डॉ. ली कि मृत्यु ने पूरे चीन में आक्रोश ला दिया। ली के प्रति चीनी नागरिकों ने कृतज्ञता जाहिर की। इसके अलावा चीनी नागरिकों ने वुहान के सुरक्षा और स्वास्थ्य विभाग द्वारा शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज करने के लिए आलोचना की कोशिश की जिसे चीन की सरकार द्वारा पूरी तरह दबा दिया गया।

अपनी मृत्यु से पहले ली ने कुछ मीडिया समूहों से बात भी की थी। ली ने एक मीडिया से बात करते हुए कहा था कि “यदि सरकारी अधिकारी इस महामारी का खुलासा पहले कर देते तो यह बेहतर होता। इस पूरे घटनाक्रम में अधिक खुलापन और पारदर्शिता होनी चाहिए।”

यह स्पष्ट संकेत है कि चीन की वामपंथी सरकार द्वारा किस तरह ना सिर्फ अपने नागरिकों को मरने के लिए छोड़ दिया बल्कि पूरे विश्व में इस महामारी को फैलने से रोकने के लिए जरूरी कदम भी नहीं उठाये गए। इसके बाद क्रूरता की हद तब हो गई जब चीन के इस वामपंथी षड़यंत्र को ली जैसे व्यक्तियों ने सामने लाया तो उनकी भी रहस्यमय मृत्यु हो गई।

ली ने साफ कहा था कि इस मामले में खुलापन और पारदर्शिता जरूरी है। और आज 11 हजार से अधिक लोगों के मरने के बाद भी चीन इस पूरे मामले पर खुलकर कुछ नहीं बता रहा है। ना चीन इसकी जिम्मेदारी ले रहा है ना इस चाईनीज़ वायरस के बारे में जानकारी दे रहा है। इसके अलावा चीन ने अन्य देशों की मीडिया पर वहाँ रिपोर्टिंग पर भी प्रतिबंध लगा दिए हैं। चीन हर मुद्दें पर सेंसर करता नज़र आ रहा है।

चाईनीज़ वायरस की जानकारी देने वाले डॉ. ली ने एक मीडिया समूह को बताया था कि उन्होंने SARS (कोरोना समूह का एक वायरस) जैसे लक्षण वाले 7 रोगियों को देखने के बाद वी चैट सोशल मीडिया में एक क्लोज़ ग्रुप अपने साथियों को इस संदिग्ध बीमारी की जानकारी दी थी। ली के अनुसार चाईनीज़ वायरस के शिकार इन रोगियों को अस्पताल द्वारा क्वारंटाइन (अलग-थलग या एकांत) में भेजा जा रहा था।

ली ने बताया कि वी चैट के उस क्लोज़ ग्रुप में यह चर्चा जोरों से थी कि यह चाईनीज़ वायरस एक नया SARS प्रकोप हो सकता है और सभी को मानसिक रूप से इसके लिए तैयार रहना चाहिए।

चीन में चाईनीज़ वायरस की जानकारी देने और सतर्क करने वालों को ढूंढ कर गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार हुए 8 लोगों में डॉ. ली भी एक थे। उन्हें एक आरोप कबूलनामे दस्तावेज में हस्ताक्षर कराया गया जिसमें कहा गया कि वो गैरकानूनी काम (चीन की गलतियों की जानकारी को चीनी वामपंथी सरकार गैरकानूनी कहती है) को छोड़ दे या कानूनी सजा का सामना करने के लिए तैयार रहे। इसके बावजूद अपनी मौत से पहले ली ने कुछ मीडिया समूह में इस विषय पर बात की और अपने अनुभव साझा किए।

ली का कहना था कि “एक स्वस्थ समाज में सिर्फ एक ही आवाज़ नहीं होनी चाहिए।” लेकिन ली को शायद यह नहीं पता था कि वामपंथी-माओवादी सरकार में सिर्फ एक ही आवाज़ होती है, एक ही चेहरा होता है और एक विचार होता है। वामपंथी शासन में दूसरी आवाज़ निकालने का हश्र वही होता है जो डॉ. ली का चीनी कम्युनिस्ट सरकार में हुआ।

ली की मौत के बाद चीन के स्वास्थ्य कर्मचारियों पर चाईनीज़ वायरस से हुए प्रभावों को उजागर करने का दबाव बना। इसके बाद चीन के द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार 14 फरवरी 2020 तक 1716 स्वास्थ्य कर्मचारी चाईनीज़ वायरस (कोरोना वायरस) की चपेट में हैं और 6 कि मौत हो चुकी है।

चीन की वामपंथी सत्ता के बुरी नज़र में आने के बाद जिस बहादुर ली की मौत हुई उसका अपना एक परिवार भी है। ली का सके बेटा और पत्नी है। ली की पत्नी गर्भवती है। अब सोचिए कि वामपंथ का यह कैसा निम्नतम रूप है जहाँ एक आवाज़ सिर्फ इसीलिए दबा दी जाती है क्योंकि उसने तानाशाही सत्ता को अनदेखा करते हुए मानव जाति को बचाने के लिए सच कहा ? या इसलिए कि वामपंथी सत्ता में मानव जीवन का कोई मूल्य ही नहीं ? अब यह दुनिया तय करेगी कि इस चाईनीज़ वायरस को लाने, छुपाने और बढ़ाने के लिए चीन के साथ क्या सलूक करना है।