गुस्से में गाँधी ने भारत के झंडे को सलूट करने से कर दिया इंकार और कहा - पहले चरखा लगाओ इसमें वरना सलूट नहीं करूँगा



या तो मेरी बात मानो वरना मैं तुम्हे नहीं मानूंगा, मोहनदास गाँधी की तानाशाही और मानसिकता कुछ इसी प्रकार की थी 

मोहनदास गाँधी जो करे वो वही, और मोहनदास गाँधी को जो अच्छा न लगे वो गलत, मोहनदास गाँधी को अगर बुढापे में कम उम्र की लड़कियों के साथ नग्न सोना है तो वो बिलकुल ठीक, गाँधी और उसके चाटुकारों की मानसिकता ये ही थी 

देश में कम ही लोगो को पता है की गाँधी ने एक बार भारत के झंडे को सलूट करने से भी इंकार कर दिया था, जिस तरह हामिद अंसारी को भारत के झंडे को सलूट करना पसंद नहीं उसी तरह गाँधी ने भी भारत के झंडे को सलूट करने से इंकार कर दिया था 

गाँधी ने ये मांग करी थी की पहले इस झंडे के डिजाईन को मेरे मुताबिक करो और इसमें चरखा लगाओ, अगर चरखा नहीं लगाया तो मैं इस झंडे को सलूट नहीं करूँगा 

सोशल मीडिया पर जानकारियों का पूरा खजाना है, वो खजाना जिसे फर्जी इतिहासकार आज तक छिपाते घूमते है, आपको भी असल इतिहास पता होना चाहिए 



"collected works of mahatma gandhi" नाम की किताब में वो दबा हुआ इतिहास लिखा हुआ है जिसके बारे में चाटुकार तत्व कभी भी नहीं बताते, गाँधी स्वयं चरखा चलाते थे, और वो चाहते थे की भारत का जो झंडा बने उसपर चरखा हो 

और गाँधी ने ऐसे झंडे को सलूट करने से इंकार कर दिया था जिसपर चरखा नहीं बना था, यानि पहले मेरी बात को मानो तो ही मैं झंडे को सलूट करूँगा, ये एक तानाशाह मानसिकता है, और गाँधीवादी तत्व इस इतिहास को पूरी तरह छिपाते है 
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