दलाई लामा की दहाड़, बोले- डोकलाम को भूल जाए चीन..अब नेहरू नहीं नरेंद्र मोदी है !


तिब्बतियों के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने बुधवार को कहा कि हिन्दी-चीनी भाई भाई की भावना ही इन दो बड़े देशों के बीच विवाद हल करने का जरिया है, भारत-चीन को एक-दूसरे के पड़ोस में ही रहना है। बता दें कि सिक्किम सेक्टर में भूटान ट्राइजंक्शन के पास चीन एक सड़क बनाना चाहता है और भारत इसका विरोध कर रहा है। 

करीब 2 महीने से इस इलाके में भारत और चीन के सैनिक आमने-सामने हैं। चीन ने भारत से कहा है कि वह इलाके से अपने सैनिकों को तुरंत वापस बुलाए, लेकिन भारत ने इससे इनकार कर दिया है।  दलाई लामा ने कहा, "डोकलाम विवाद कोई सीरियस मुद्दा नहीं है, पर दोनों देशों को एक दूसरे के पड़ोस में ही रहना है, अगर इस मुद्दे पर गलत प्रोपेगैंडा से बात बिगड़ सकती है। अभी दोनों पड़ोसी एक-दूसरे के खिलाफ सख्त बयान जारी कर रहे हैं, लेकिन हिन्दी-चीनी भाई भाई की भावना ही आगे बढ़ने का रास्ता है। 1962 में चीनी सेना बोमडिला जा पहुंची थी, लेकिन वापस लौट गई। भारत और चीन को इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा।"

"चीनी लोगों की इच्छा के मुताबिक कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना हमारे लोकतंत्र का अनुसरण (follow) कर सकती है। हमारी छोटी तिब्बत कम्युनिटी पूरी तरह से लोकतंत्र में यकीन करती है और मैं भी लोकतंत्र का प्रशंसक हूं।" दिल्ली में एक प्रोग्राम में दलाई लामा ने कहा, "किसी भी देश के लोग ही उसके असली शासक होते हैं और एक आजाद मीडिया ही लोगों को सच्चाई बता सकता है, उन्हें शिक्षित कर सकता है। जिस देश में आजादी है, वहां हम ज्यादा योगदान दे सकते हैं क्योंकि वहां ज्यादा मौके मिलते हैं, जहां आजादी नहीं है, वहां मैं जाना पसंद नहीं करूंगा।" बता दें कि दलाई 1959 के विद्रोह के दौरान तिब्बत से निकल भागे थे और तब से भारत में ही रह रहे हैं। इनका जन्म तिब्बत में हुआ था, जिस पर चीन अपना दावा करता है। चीन सरकार दलाई को अपना दुश्मन मानती है।

चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने मंगलवार को अपने एडीटोरियल में कहा था, "भारत 1962 की जंग का सबक भूल गया है, नेहरू ने हमें कमतर आंका था, मोदी भी हमारी वॉर्निंग को नजरअंदाज ना करें। अगर भारत डोकलाम विवाद पर चेतावनी को इसी तरह नजरअंदाज करता रहा तो बीजिंग जरूरी जवाबी कदम उठाएगा।" "भारत ने 1962 में बॉर्डर पर भड़काऊ गतिविधियां की। उस वक्त नेहरू सरकार ने माना था कि चीन हमला नहीं करेगा। नेहरू सरकार ने क्षेत्रीय अखंडता (territorial integrity) की रक्षा के लिए चीन सरकार के दृढ़ संकल्प (determination) को कम करके आंका था क्योंकि बीजिंग घरेलू और कूटनीतिक संकटों में फंसा था।" 

"भारतीयों को उम्मीद है कि चीन रणनीतिक चिंताओं की वजह से जंग का खतरा उठाने को तैयार नहीं है। उनका मानना है कि अमेरिका, भारत का साथ देगा, जिससे चीन पर भारी मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ेगा। ऐसा लगता है कि नई दिल्ली को ये नहीं पता है कि चीन-अमेरिकी दुश्मनी किस तरह की है। भारत को ऐसा लगता है कि वॉशिंगटन सिर्फ भारत के सपोर्ट में बयान जारी करके या हिंद महासागर में वॉरशिप भेजकर चीन-भारत बॉर्डर पर स्थिति को प्रभावित कर सकता है। दरअसल, भारत अपनी कानूनी और नैतिक समझ खो चुका है।"