राज्यसभा टीवी में ऐसी लूट की आपका सर तक चकरा जाये, राज्यसभा के पैसे से बनाई गयी फिल्मे !



हामिद अंसारी वो आखिरी कोंग्रेसी नेता थे, जो एक उच्च संवैधानिक पद पर विराजमान थे. उनसे पहले के सभी कोंग्रेसी नेता पहले ही गद्दी से उतारे जा चुके हैं. हामिद अंसारी को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ उन्होंने उपराष्ट्रपति पद का दुरुपयोग किया है. आरोप हैं कि पद पर रहते हुए उन्होंने अपने अंडर आने वाले राज्यसभा टीवी में बड़े पैमाने पर घोटालों को होने दिया.

बताया जा रहा है कि हामिद अंसारी ने राज्यसभा टीवी के नाम पर अपने करीबियों को गलत तरीके से फायदा पहुंचाया है. ऐसे ही आरोपों के चलते अरविन्द केजरीवाल के कई मंत्रियों के खिलाफ भी सीबीआई जांच पहले से चल रही है. ख़बरों के मुताबिक़ केंद्र में मोदी सरकार के आने से पहले से ही राज्यसभा टीवी में यह कथित घोटाला चल रहा था.

तकनीकी तौर पर राज्यसभा से जुड़े सभी वित्तीय अधिकार उपराष्ट्रपति के तहत आते हैं. किसी भी फैसले को लेने के लिए उसे केंद्रीय कैबिनेट से इजाजत की जरुरत नहीं होती. राज्यसभा टीवी चैनल की शुरुआत 2011 में हुई. बताया जा रहा है कि शुरुआत से ही राज्यसभा टीवी चैनल घोटालों का अड्डा रहा है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ सबसे पहले हामिद अंसारी ने अपने करीबी गुरदीप सप्पल को राज्यसभा टीवी का सीईओ बना दिया. चैनल के कामकाज की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि, गुरदीप सप्पल ने योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि कोंग्रेसी और कम्युनिस्ट पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को चैनल में नौकरी दी.

केवल दिखावे के लिए इंटरव्यू आयोजित किए गए, लेकिन इंटरव्यू देने आए योग्य और पेशेवर उम्मीदवारों को अपमानित करके भगा दिया जाता था. जिन कांग्रेसी चमचों और कम्युनिस्टों को नौकरी पर रखा गया, उन्हें तनख्वाह के तौर पर मोटा पैकेज दिया गया. नौकरी पर रखे ज्यादातर लोग अयोग्य व् अन्य जगहों में नौकरी से निकाले गए लोग थे. तनख्वाह भी ऐसी मोती दी गयी, जितनी बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों को भी नहीं मिलती.

वैसे तो राज्यसभा टीवी का पहला काम होता है राज्यसभा की कार्यवाही का प्रसारण करना. हालांकि इसके अलावा चैनल संसदीय कार्य से जुड़े कार्यक्रम व् अन्य समसामयिक कार्यक्रम भी दिखा सकता है. लेकिन आरोप है कि चैनल पर लाखों रुपये खर्च करके ऐसे कार्यक्रम दिखाए जाते रहे, जिनका संसदीय लोकतंत्र से दूर-दूर तक कोई लेना-देना ही नहीं था.

सरकारी पैसों की सामूहिक लूट के लिए चैनल पर कांग्रेसी पत्रकारों को एक्सपर्ट दिखाकर बुलाया जाता रहा और उन्हें इसके लिए हर महीने मोटी रकम दी गई. कई अन्य कोंग्रेसी चापलूस पत्रकारों को गेस्ट एंकर की तरह रखा गया. छोटे-छोटे कार्यक्रम के लिए इन्हे हर महीने लाखों रुपये फीस दी जाती रही. इन संपादकों में द वायर के एमके वेणु, कैच के भारत भूषण, इंडियास्पेंड.कॉम के गोविंदराज इथिराज और उर्मिलेश जैसे नाम शामिल थे.


इन सभी को कांग्रेस की चापलूसी करने के लिए जाना जाता है. ऐसी जबरदस्त फिजूलखर्ची के चलते राज्यसभा टीवी का बजट लोकसभा टीवी के मुकाबले कई गुना अधिक हो गया था. हद तो तब हो गयी जब अपना कार्यकाल ख़त्म होने के वक़्त चैनल के सीईओ गुरदीप सप्पल ने रागदेश नाम से एक फिल्म बनवा डाली. कहा जा रहा है कि इन महाशय ने राज्यसभा टीवी के बजट से 14 करोड़ रुपये इस फिल्म को बनाने के लिए उड़ा दिए. इस फिल्म में दिग्विजय सिंह की पत्नी अमृता राय ने भी रोल किया है.

लूट का आलम तो देखिये कि इस फिल्म की प्रोडक्शन क्वालिटी इतनी बेकार है कि देखकर लगता ही नहीं कि इस पर 4-5 करोड़ से ज्यादा का खर्च आया होगा. बाकी बचे हुए पैसे किसकी जेब में गए? ये पूछने वाला कोई नहीं है, क्योंकि माननीय सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति व् उपराष्ट्रपति से इस देश में सवाल किया ही नहीं जा सकता वरना संवैधानिक पद का अपमान माना जाता है.

पिक्चर अभी ख़त्म नहीं हुई है, आगे देखिये कि फिल्म बनने के बाद इसके प्रमोशन के लिए भी 8 करोड़ रुपये का बजट दे दिया गया. जबकि इस पर ज्यादा से ज्यादा 2 करोड़ का खर्च ही बताया जा रहा है. यानी यहाँ भी सरकारी पैसों का गबन.

सभी हदें तब पार हो गयीं, जब संसद के मॉनसून सत्र के दौरान चैनल के सीईओ सप्पल राज्यसभा टीवी की पूरी टीम को लेकर फिल्म का प्रोमोशन करने के लिए मुंबई चले गए. इनमें एडमिन हेड चेतन दत्ता, हिंदी टीम के प्रमुख राजेश बादल, इंग्लिश टीम के हेड अनिल नायर, टेक्निकल हेड विनोद कौल, आउटपुट हेड अमृता राय (दिग्विजय की पत्नी), इनपुट हेड संजय कुमार समेत एडिटोरियल टीम के कम से कम 20 सदस्य शामिल थे.

फिल्म के प्रोमोशन के नाम पर सबने लगभग एक महीने तक पूरे देश में सैर-सपाटा किया. अभी तो केवल शुरुआत भर है. अभी तो कई और खुलासे होने बाकी हैं. चैनल को चलाने में आर्थिक हिसाब-किताब, भर्तियों में घोटाला, तनख्वाह और प्रोफेशनल फीस बांटने में भेदभाव जैसे काई मामलों की पूरी जांच कराई जाने की जरूरत है, ताकि देश की जनता को पता चल सके कि कोंग्रेसी जिस भी पद पर पहुंच जाए, वहीँ घोटाला करने से बाज नहीं आता.

कहने को तो उपराष्ट्रपति का पद राष्ट्रपति के नीचे का होता है, लेकिन उनका बजट राष्ट्रपति के बजट से काफी ज्यादा होता है. यदि वर्तमान का बजट देखें तो राष्ट्रपति के लिए 66 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, वहीं उपराष्ट्रपति के लिए लगभग 6 गुना ज्यादा यानि 377.21 करोड़ रुपए आवंटित किये गए हैं.

उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति होता है. उसका अपना सचिवालय होता है, जिसमें 1500 से ज्यादा अधिकारी और कर्मचारी होते हैं. इसके अलावा राज्यसभा टीवी का मुखिया भी उपराष्ट्रपति ही होता है. ऐसे में हम सवाल उठा रहे हैं कि क्या इस घोटाले की जांच नहीं की जानी चाहिए? क्या संवैधानिक पद की गरिमा को देखते हुए भ्रष्टाचार करने वालों को छोड़ दिया जाना चाहिए?

घोटाले में यदि आरोप सच साबित होते हैं तो इसमें शामिल लोगों की संपत्ति जब्त करके उनसे जनता का लूटा हुआ पैसा नहीं वसूल किया जाना चाहिए? क्या संविधान की दुहाई देते हुए भ्रष्टाचारियों को सजा नहीं होनी चाहिए? मनमोहन सरकार के दौरान हुए घोटालों का बाहर आना जारी है, अभी तो कई अन्य चौंकाने वाले खुलासे होने है.