गोरखपुर में मेडिकल जिहाद : रेप, फर्जीवाड़े के आरोपी को अखिलेश यादव ने बनाये रखा पद पर


कथित रूप से बच्चों की जान बचाने पर मीडिया में हीरो बने डॉ. काफिल को क्यों हटाया गया पद से। डॉ. काफिल के स्याह सच से रूबरू होइए।

नई दिल्लीः गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में हालात बिगडने पर सिलेंडरों की कथित व्यवस्था कर मीडिया में हीरो बने डॉ. काफिल को वाइस प्रिंसिपल पद से हटा दिया गया है। उन पर दायित्वों में लापरवाही बरतने के आरोप लगे हैं। बच्चों की तथाकथित रूप से जान बचाने के लिए मीडिया और सोशल मीडिया में डॉ. कफील का काफी महिमामंडन हुआ, मगर बाद में उनका स्याह पहलू भी उजागर हुआ। पता चला कि वे इससे पहले विवादों में घिरे रहे हैं। संकट के दिन चंद सिलेंडर लाकर फोटो खिंचाकर प्रायोजित रूप से हीरो बने। जबकि संकट पैदा करने में काफी हद तक उनकी और प्राचार्य की नीतियां जिम्मेदार रहीं। जिस इंसेफ्लाइटिस वार्ड के डॉ. काफिल प्रभारी रहे, उसी वार्ड में बच्चों की मौतें हुईं।

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फोटो-डॉ. काफिल के प्राइवेट हास्पिटल की जानकारी वाला पत्र

योगी ने लगाई बंद कमरे में क्लास

मेडिकल कॉलेज के सूत्रों ने बताया कि जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मेडिकल कॉलेज पहुंचे तो उन्होंने बंद कमरे में पूरे स्टाफ की क्लास लगाई। डॉ, पूर्णिमा से पूछा कि एक दिन में कितने सिलेंडर की जरूरत होती है तो उन्होंने बताया कि 21। वहीं काफिल से पूछा कि जब 21 सिलेंडर की जरूरत होती है तो फिर तीन सिलेंडर की व्यवस्था करके मीडिया में हीरो बनने चले गए। सूत्र बताते हैं कि योगी ने फटकारते हुए कहा कि अगर आप लोग जिम्मेदारी से काम किए होते तो ऐसी नौबत ही नहीं आती। एक तो खुद संकट पैदा किया और ऊपर से सिलेंडर की फोटो खिंचाकर हीरो बनने की कोशिश की।

इसके बाद योगी के निर्देश पर मेडिकल कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल पद से डॉ. काफिल को हटा दिया गया।जो सिलेंडर काफिल ने लाया, वह कॉलेज का ही था

योगी आदित्यनाथ जब मेडिकल कॉलेज पहुंचे तो उन्हें चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं। बंद कमरे में पूछताछ के दौरान स्टाफ ने बताया कि प्राचार्य डॉ. राजीव मिश्रा ने डॉ. काफिल को परजेज कमेटी की जिम्मेदारी सौंप रखी है। यही नहीं आक्सीजन सिलेंडर कॉलेज के पैसे से खरीदा जाता रहा, मगर काफिल उस सिलेंडर को अपने प्राइवेट हास्पिटल में यूज करते रहे। प्राचार्य, उनकी पत्नी पूर्णिमा शुक्ला और डॉ. काफिल की तिकड़ी ने मिलकर मेडिकल कॉलेज को निजी जागीर बना रखा था।

अगर इनके स्तर से भ्रष्टाचार नहीं हुआ होता तो शायद बच्चों को असमय काल के गाल में न समाना पड़ता।

बाकी डॉक्टरों का ध्यान बच्चों की देखभाल में था, लेकिन कफील का ध्यान मीडिया पर था। आखिरकार उन्होंने अपने बारे में झूठी खबरें प्लांट करके खुद को पूरे वाकये का हीरो बनवा ही लिया।

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डॉक्साब...फंसे हैं रेप और फर्जीवाड़े में

2009 में मेडिकल कॉलेज की परीक्षा में दूसरे अभ्यर्थी से परीक्षा दिलाने में डॉ. काफिल पर केस चल रहा है। इसके अलावा 15 मार्च 2015 को एक महिला के साथ क्लीनिक पर दुष्कर्म करने का भी मुकदमा झेल रहे हैं।

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साथी डॉक्टर लगे थे इलाज में, काफिल खिंचा रहे थे फोटो

एक डॉक्टर ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बताया कि जब पूरा स्टाफ मौत से जूझ रहे बच्चों की जिंदगी बचाने में जुटा था, उस वक्त डॉ. काफिल वार्ड की जगह बाहर कैंपस में बच्चों को चेक कर रहे थे। वहीं मीडिया वालों से बात करने में बिजी थे। मकसद था हीरो बनने का। ऐसा साबित कर रहे थे, जैसे कि पूरी व्यवस्था वही चला रहे हों।

हार्ले डेविडसन की बाइक से चलते हैं डॉक्टर साहब

गोरखपुर के लोग बताते हैं कि मेडिकल कॉलेज की नौकरी के साथ प्राइवेट प्रैक्टिस करने से खूब पैसा काफिल ने कमाया। जिस गोरखपुर में बहुत कम लोग बुलेट से चलते हैं, वहां वे हार्ले डेविडसन जैसी बाइक से सड़कों पर फर्राटे भरते नजर आते हैं। रईसी में तब से जिंदगी जी रहे हैं, जब से उन्हें गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में दवाओं की खरीद से जुड़ी परचेजिंग कमेटी का मेबर बनाया गया।

नए प्राचार्य को मिली जिम्मेदारी

डॉ. राजीव मिश्रा के निलंबन के बाद शासन ने गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की जिम्मेदारी डॉ. पीके सिंह को सौंपी है। डॉ. सिंह फिलहाल राजकीय मेडिकल कॉलेज, अंबेडकरनगर के कार्यवाहक प्राचार्य हैं। अब वे गोरखपुर की भी अतिरिक्त जिम्मेदारी निभाएंगे। अपर मुख्य सचिव ने उनकी तैनाती के आदेश जारी कर दिए हैं।