NDTV ने 10 हज़ार रुपए देकर रमेश नाम के शख्स को असलम बना दिया, और स्क्रिप्ट के तहत उसे.....


दो तीन दिन से रवीश कुमार पेड न्यूज पर खूब चिल्ला रहे है .. मै सोच रहा था की चूँकि रवीश कुमार भी अरविन्द केजरीवाल की तरह ईमानदार है इसलिए "पेड न्यूज और मोदी मीडिया" के अपने सीरिज में वो गुजरात विधानसभा 2007 और 2012 में एनडीटीवी की गुजरात में की गयी रिपोर्टिंग भी जरुर दिखाएंगे ....

विश्व की मीडिया के इतिहास में एनडीटीवी ने गुजरात विधानसभा चुनावो 2007 और 2012 में जो रिपोर्टिंग की है, वो विश्व में मीडिया जगत में एक काला धब्बा है .. इसी वजह से एनडीटीवी से कई बड़े पत्रकार जो सच में निष्पक्ष मीडिया के पैरोकार है उन्होंने एनडीटीवी छोड़ दी थी ...

अब जानिये  कुछ अंश ..एनडीटीवी ने गुजरात विधानसभा चुनाव 2007 और फिर 2012 में क्या रिपोर्टिंग की थी 

1 - विनोद दुआ वडोदरा एयरपोर्ट पर उतरते है .. फिर वडोदरा अहमदाबाद एक्सप्रेस से एक इनोवा टैक्सी में बैठते थे ... फिर कहते है "ये जो आप खुबसूरत एक्सप्रेस हाइवे देख रहे है .. इसे बनाने में मोदी का रत्ती भर रोल नही है .. ये केंद्र सरकार ने बनवाया है" [जबकि ये एक्सप्रेस हाइवे अटल जी ने बनाया था और उनके शिलान्यास और उद्घाटन दोनों की शिलालेख आज भी गेट पर लगा है ]

फिर विनोद दुआ गुजरात दंगो की बात करने लगते है .. कहने लगे की हिन्दुओ ने मुस्लिम महिलाओ के पेट चीरकर बच्चा निकालकर आग में फेक दिया था .. जबकि आज तक कोई भी मुस्लिम महिला या उनके परिवार ने ये शिकायत दर्ज नही करवाई .. न की किसी जाँच में ये लिखा गया ... फिर वो ड्राइवर से उसका नाम पूछते है .. ड्राइवर नाम बताता है -मोहम्मद असलम शेख .. और दंगो की चर्चा करते करते ड्राइवर जान बुझकर रोने की एक्टिंग करने लगता है .. फिर विनोद दुआ उसे आंसू पोछने ने लिए रुमाल देते है ..

बाद में एक लोकल टीवी चैनेल पर उस ड्राइवर ने अपना नाम रमेशभाई सोलंकी बताया और बोला की उसे ये स्क्रिप्ट दी गयी थी और दस हजार रूपये दिए गये थे ...

2- रविश कुमार 2012 गुजरात विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग करने गुजरात आये .. तब तक अहमदाबाद का साबरमती रिवरफ्रंट बनकर तैयार हो गया था ..गुजरात सरकार की स्लम हटाओ स्कीम के तहत अहमदाबाद के सभी झोपड़पट्टी हटाकर उन्हें फ़्लैट दे दिए गये थे .. ऐसे फ़्लैट अहमदाबाद में कई जगह बने हुए है .. फिर भी रविश कुमार पता नही कहा से एक झोपड़पट्टी खोज लिए और वही से रिपोर्टिंग करने लगे .. 

ये देखिये ..ये है गुजरात का असली विकास ...
फिर रविश कुमार अहमदाबाद के मुस्लिम इलाके जुहापुरा गये .. वहां से रिपोर्टिंग किये .. लेकिन किसी महिला से ये नही पूछे की आपके कितने बच्चे है आपके घर में कितने सदस्य है .. मुस्लिम लोग हर नौ महीने में एक बच्चा पैदा करते रहे .. नानी, माँ और बेटी तीनो की एक साथ डिलेवरी होती रहे .. और उन्हें खाना घर देने की जिम्मेदारी सरकार की है .. यही रविश कुमार देश को समझाने लगे ..

3- नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार करने प्लेन से कच्छ जा रहे थे .. मोदी जी प्लेन से कच्छ में जनसभा को सम्बोधित करने जा रहे थे और एनडीटीवी के एडिटर विजय त्रिवेदी को अपने प्लेन में बैठा लिया .. ताकि समय बचे और यात्रा के दौरान इंटरव्यू भी हो जाये ..

सिर्फ दो सवालों के बाद इसने मोदी जी से पूछा की आपने गुजरात में मुसलमानों का कत्लेआम करवाया है तो आप इस पर मुसलमानों से माफ़ी कब मागेंगे ? मोदी जी ने जबाब दिया माफ़ी क्यों ? अगर मै दोषी हूँ तो मुझे फांसी पर लटकाओ .. अगर आपके अनुसार मै कातिल हूँ तो क्या मेरे गुनाह इतने छोटे है की मेरे माफ़ी से वो धुल जायेंगे ? क्या आपको भारत के अदालतों पर भरोसा नही है ? क्या दंगाई को सिर्फ माफ़ी मंगवाकर छोड़ देना चाहिए ?

लेकिन ये बार बार कहता रहा की आप माफ़ी क्यों नही मांगेंगे .. जब ये इसी बात पर अड़ा रहा तो थोड़ी देर मोदी जी खामोश हो गये .. लेकिन ये माफ़ी माफ़ी चिल्लाता रहा .. फिर मोदी जी ने पाइलट से पूछा की अभी सबसे नजदीक एयरस्ट्रिप कौन सा है ? पाइलट ने जबाब दिया की इस पोजीसन से राजकोट या अमरेली दोनों पास रहेगा .. मोदी जी ने कहा प्लेन को अमरेली में उतार लो ..

और इस लल्लू विजय त्रिवेद को प्लेन से लात मारकर मोदी जी ने भगा दिया था ... फिर ये नीचे उतरकर कैमरे पर कहने लगा की मोदी जी की ये मेरे पर मेहरबानी रही की उन्होंने मुझे प्लेन से उतारा प्लेन से फेका नही ..

इस घटना को एनडीटीवी ने सैकड़ो बार दिखाया .. की मेरे एडिटर को मोदी ने बीच रास्ते में प्लेन से उतार दिया ...

गुजरात दंगो में सबसे ज्यादा एक्टिव एनडीटीवी रहा है .. उसमे स्टूडियो में शबनम हाश्मी, मुकुल सिन्हा, जावेद आनन्द, तीस्ता, मेघा पाटकर, अग्विवेश, आशीष खेतान, प्रशांत भूषण, वृंदा ग्रोवर, जैसे सैकड़ो हिन्दू विरोधी लोगो को कई घंटे की कवरेज मिलती थी .. 

ये चैनेल तब अदालत और कानून पर भरोसा रखने की बात क्यों नही करता था ? तब रविश कुमार क्यों नही कहते थे की हम एंकरों को टीवी स्टूडियो में बैठकर पोस्टमार्टम करने की बजाय अदालतों पर भरोसा करना चाहिए ?