लाशों पर हंस रहे थे स्थानीय जिहादी, हत्यारे भी कश्मीरी, और कहा जा रहा है "कश्मीरियत जिंदा है"


कश्मीरियत... कश्मीरियत... कश्मीरियत... इस शब्द से हमारा पाला आये दिन पड़ता है। कश्मीर के लोग जवानों पर पत्थर बरसाते हैं और जवानों को गाली देकर कश्मीरियत के साथ खड़े हो जाते है। आए दिन कश्मीरियों के लिए कुछ तथाकथित लोगों का प्रेम उफान मारता है। 

जिस कश्मीरियों के लिए प्रेम उमड़ता है वही आतंकवादी को मदद कर हमले को अंजाम देते है। अंधाधुंध गोलियां चल रही थी और लोग लाश बन कर बस की फर्श पर गीर रहे थे। बस में मौत का मंजर देख लोग बचाओ-बचाओ चिल्ला रहे थे और दुकानों पर खड़ी कश्मीरियत बस में बैठे मासूम निहथे भक्तों पर हंस रही थी।

जी हां, ये वही कश्मीरियत थी जो हमारे जवानों को पत्थर मारती है, ये वही कश्मीरियत है जो आये दिन पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाती है, ये वही कश्मीरियत है जो आतंकवादियों को पनाह देती है, ताकि वो भारत को लहूलुहान कर सके। 

घायल वलसाड के राजेश नवल भाई ने बताया कि हमले वाली जगह के पास कई दुकानें थीं। बस में महिलाएं, वृद्ध चिल्ला रहे थे। लेकिन दुकानदार हमें देखकर हंस रहे थे। कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आया। लोग चिल्ला रहे थे चीख रहे थे रो रहे थे पर उन खड़े कश्मीरियों पर कोई असर नहीं पड़ा।

उस आतंकी हमले में घायल हुई योगिता बेन ने बताया कि हम श्रीनगर से साढ़े 6 बजे रवाना हुए थे। हमारे साथ तीन और बसें थी। रास्ते में बस पंक्चर हो गई। 

हम पीछे रह गए थे। पंक्चर निकालने के बाद रवाना होने लगे तभी पंक्चर वाले ने कहा कि बस में एक और पंक्चर है, ये कह कर बस रोक ली, पंक्चर वाले ने पंक्चर बनाने में लगभग दो घंटे लिए। अगर मुकेश और हर्ष न होते तो आज बस का कोई भी व्यक्ति जिन्दा नहीं होता। भीषड़ गोलीबारी के बीच भी दोनों ने मानसिक संतुलन नहीं खोया।

मुकेश पटेल और हर्ष देसाई बस के गेट के पास बैठे थे। फायरिंग शुरू होते ही मुकेश के पास बैठे यात्री की मौत हो गई। फायरिंग करते आतंकी दौड़ते हुए बस के गेट की तरफ भागे तो मुकेश और हर्ष नीचे झुककर गेट बंद करने भागे। तभी दो गोलियां हर्ष के कंधे और हाथ पर लगीं। 

एक गोली मुकेश के गाल को चीरते हुए निकल गई। लेकिन दोनों ने रेंगते हुए बस का गेट लॉक कर दिया। इससे आतंकी अंदर नहीं घुस पाए। उनकी दिलेरी ने बस के बहुत से लोगो की जान बचा ली।