16 जुलाई - नमन है उस महान बलिदान तारू सिंह को सर कटवा दिया पर इस्लाम नहीं अपनाया !


"सिर जाए तां जाए, मेरा सिखी सिदक ना जाए"... गुरबानी का यह कथन सिख धर्म में अपने गुरु 'केश' (बालों) की रक्षा करने की सीख देता है। एक ऐसा धर्म जिसमें उसूल ही सब कुछ है। अपने गुरु की मर्यादाओं पर चलना, उन्हें प्रेम भाव से समझना और हर एक नियम का दिल से आदर एवं सम्मान करना सिख धर्म की पहचान है। इन्हीं नियमों को मरकर भी मरने ना देने की कसम खाई थी 'भाई तारू सिंह' ने। 

एक ऐसा सिख जिनका नाम सिख धर्म के इतिहास में गर्व से लिया जाता है। उनकी शहीदी को कोई भी सिख भाई भूल नहीं सकता, यही कारण है कि उनके नाम तारू सिंह के सामने सिख उन्हें भाई लगाकर सम्मान देते हैं। अपने धर्म का निरादर ना होने देने का वचन उन्होंने आखिरी सांस तक निभाया।

यह तब की बात है जब गुरु की नगरी कहलाने वाले पंजाब के अमृतसर में मुगलों का राज हो गया था। वे अपनी इच्छानुसार हर किसी धर्म के व्यक्ति को इस्लाम में शामिल कर अपनी ताकत बढ़ाना चाहते थे, लेकिन भाई तारू सिंह को शायद यह मंजूर ना था।तारू सिंह अपनी माता के साथ पहूला गांव में रहते थे। वे सिख धर्म में सच्ची निष्ठा एवं विश्वास रखते थे। 

धर्म ही उनका सब कुछ था और उसके लिए वे कुछ भी करने को उतारू थे। एक दिन तारू सिंह के यहां रात्रि में विश्राम के लिए जगह खोजते हुए रहीम बख्श नाम का एक मछुआरा आया। तारू सिंह ने ना केवल उसकी सहायता कि बल्कि उसे पेट भर भोजन भी कराया।

रात्रि के दौरान मित्र भावना से रहीम बख्श ने तारू सिंह से एक बात बांटना सही समझा। उसने बताया कि पट्टे जिले के कुछ मुगल उसकी बेटी को अग़वा कर ले गए हैं इसीलिए वह उनसे नज़र चुराता घूम रहा है। उसने इसकी शिकायत कई जगह की लेकिन उसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं है। 

तारू सिंह मुस्कुराया और कहा कि तुम चिंता मत करो, कोई और नहीं तो गुरु के दरबार में तुम्हारी पुकार पहुंच गई है। जल्द ही तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल जाएगी। अगले दिन रहीम बख्श वहां से चला गया लेकिन तारू सिंह ने बिना किसी स्वार्थ से उसकी मदद करनी चाही।


उसने सिखों के एक गुट को यह बात बताई जिसके बाद उन बहादुर सिखों ने पट्टी के उन मुगलों के यहां घुसकर उन्हें मार-पीटकर रहीम बख्श की बेटी को रिहा कराया। यह खबर मिलने पर तारू सिंह बेहद प्रसन्न हुए लेकिन कोई था जिसे यह बात बिल्कुल भी गवारा नहीं थी। 

किसी खबरी ने रहीम बख्श की बेटी के रिहा होने के पीछे तारू सिंह का हाथ है, इसकी खबर उस क्षेत्र के मुगलिया सरदार 'ज़कारिया खान' तक पहुंचा दी। ज़कारिया खान गुस्से से आग बबूला हो गया, उसने फ़ौरन अपने सैनिकों से कहकर तारू सिंह को गिरफ्तार कर पकड़कर लाने को कहा।


आज्ञा पाकर सैनिक जल्द से जल्द तारू सिंह के घर पहुंच गए। आश्चर्य की बात तो यह है कि अपनी गिरफ्तारी की खबर सुनकर भी तारू सिंह परेशान ना हुआ, बल्कि उसने भोजन के समय को देखते हुए सैनिकों से पहले कुछ खाने का आग्रह किया। तारू सिंह के कई बार कहने पर सैनिक मान गए और भोजन करने के बाद ही उसे गिरफ्तार करके ज़कारिया खान के दरबार में ले गए। 

अपने दरबार में एक सिख को कैदी देख ज़कारिया खान बहुत खुश हुआ। उसने कई बार सिख बहादुरों के किस्से सुने थे। सिख कभी किसी से डरते नहीं हैं यह बात वह अच्छी तरह से जानता था लेकिन यहां उसने अपने दिमाग को होशियारी से चलाना सही समझा।


उसने सोचा यदि किसी तरह से वह तारू सिंह को इस्लाम कबूल करने के लिए राज़ी कर ले तो शायद उसकी तरह ही अन्य सिख धर्म को मानने वाले लोग भी इस्लाम की ओर अपना झुकाव बढ़ा दें। जिसके परिणामस्वरूप उसकी ताकत बढ़ती जाएगी, लेकिन उसकी यह सोच कोई रंग ना ला पाई। 

ज़कारिया खान ने तारू सिंह से कहा, "तारू सिंह... तुमने जो किया वह माफी के लायक बिलकुल नहीं है, लेकिन मैं तुम्हे एक शर्त पर छोड़ सकता हूं। तुम इस्लाम कबूल कर लो, हमारे मित्र बन जाओ मैं तुम्हारी सभी गलतियों को नजरअंदाज कर दूंगा।"


ज़कारिया खान का प्रस्ताव पाते ही पहले तो तारू सिंह मुस्कुराया फिर बोला कि चाहे जान चली जाए लेकिन वह अपने गुरुओं के साथ गद्दारी कभी नहीं करेगा। तारू सिंह ज़कारिया खान की तरकीब को भली-भांति समझ चुका था इसलिए उसने बिना किसी भय के भरे दरबार में ज़कारिया खान को ललकारा। गुस्से में आकार ज़कारिया खान ने तारू सिंह को कैदखाने में बंद करवा दिया। रोज़ाना बहुत लोग आते और तारू सिंह को विभिन्न लालच देते हुए इस्लाम कबूल करने को कहते लेकिन वो सबके लिए एक अच्छा जवाब तैयार रखता था। अंतत: ज़कारिया खान ने तारू सिंह को सज़ा देने का फैसला किया।


उसे दो बड़े पहियों के बीच बांध दिया गया, कई तसीहे दिए गए लेकिन तारू सिंह ने उफ़ ना किया। आखिरकार ज़कारिया खान ने तारू सिंह के सिख धर्म से जुड़े कट्टर विश्वास को तोड़ने के लिए उसके बाल ही काट देने का फैसला किया। लेकिन ऐसा कोई भी नाई नहीं था जो तारू सिंह के बालों को काटने की हिम्मत रखता हो। 

यह खबर ज़कारिया खान तक पहुंची तो उसने गुस्से में आकर तारू सिंह की खोपड़ी ही उसके सिर से अलग कर देने का फैसला किया। ताकि ना ही उसके बाल रहेंगे और ना ही कभी दोबारा आएंगे। ऐसा करने से पहले उसने फिर से तारू सिंह को चेतावनी दी लेकिन तारू सिंह ने जवाब दिया – 'मैं अपने केशों के साथ अपने धर्म के प्रति अपनी सच्ची निष्ठा बनाए रखूंगा, लेकिन तुम्हे तुम्हारे कर्मों की सज़ा मैं ही दूंगा।"


लेकिन ज़कारिया खान तारू सिंह की बात को बिना समझे अपने हठ पर रहा और अंत में आदेशानुसार एक जल्लाद द्वारा तारू सिंह की खोपड़ी अलग कर दी गई और उसे महल के बाहर खाई में फेंक दिया गया। कहते हैं कि जब तारू सिंह पर यह दर्दनाक प्रहार किया जा रहा था तब भी वो चुप था और मन ही मन सिख धर्म के पहले गुरु नानक देवजी द्वारा रचा गया 'जपुजी साहिब' का पाठ कर रहा था। 

यह खबर जब खालसा पंथ के कुछ लोगों तक पहुंची तो वे फटाफट जाकर खाई में से तारू सिंह को बाहर निकालकर ले आए। तारू सिंह को एक धर्मशाला में लाया गया जहां उसकी मरहम-पट्टी की गई, लेकिन कुछ संभव इलाज के बाद तारू सिंह ने आगे का इलाज कराने से मना कर दिया और अपना ध्यान 'गुरु को याद' करने में लगा दिया।


तारू सिंह की इसी बहादुरी को संसार ने अपना सिर झुकाया .. धर्म की रक्षा हेतु आने वाले सभी ने इस वीर बलिदानी को तारू सिंह से 'भाई तरू सिंह' का दर्जा दिया जो आज भी उसी प्रकार से कहा जा रहा है और शायद सदा कहा जाएगा . । इतना ही नहीं भाई तारू सिंह को सम्मान देते हुए सिख धर्म की 'अरदास' में भी उनकी शहीदी को जगह दी गई। अरदास के एक कथन में 'खोपड़ियां लुहाईयां' बोला जाता है जो शहीद भाई तारू सिंह जी की याद में ही शामिल किया गया है।